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संन्यास का अर्थ
 

संन्यास पर ओशो के विचार

"जीवन को आत्म-अज्ञान के बिंदु से देखना संसार है; आत्म-ज्ञान के बिंदु से देखना संन्यास है। इसलिए जब कोई कहता है कि मैंने संन्यास लिया है, तो मुझे बात बड़ी असत्य मालूम होती है। यह लिया हुआ संन्यास ही संसार के विरोध की भ्रांति पैदा कर देता है। संन्यास भी क्या लिया जा सकता है? क्या कोई कहेगा कि ज्ञान मैंने लिया है? लिया हुआ ज्ञान भी क्या कोई ज्ञान होगा?
ऐसा ही लिया हुआ संन्यास भी, संन्यास नहीं होता है। सत्य ओढ़े नहीं जाते हैं। उन्हें तुम्हारे भीतर जगाना होता है। संन्यास का जन्म होता है। वह समझ से आता है। उस समझ से हम परिवर्तित होते जाते हैं। जैसे-जैसे हमारी समझ बदलती है, हमारी दृष्टि बदलती है और अनायास ही आचरण भी बदल जाता है। संसार जहां का तहां होता है, पर हमारे भीतर संन्यास का जन्म होता जाता है।
संन्यास का अर्थ है: यह बोध कि मैं शरीर ही नहीं हूं, आत्मा हूं। इस बोध के साथ ही भीतर आसक्ति और अज्ञान नहीं रह जाता है। संसार बाहर था, अब भी वह बाहर होगा, पर भीतर उसके प्रति राग-शून्यता होगी, या यूं कहें कि संसार अब भीतर नहीं होगा।"

ओशो, साधना पथ, प्रवचन 3


"संन्यास में हमने एंट्रेंस तो रखा है, एक्झिट नहीं रखा है। उसमें भीतर जा सकते हैं, बाहर नहीं आ सकते। और ऐसा स्वर्ग भी नरक हो जाता है जिसमें बाहर लौटने का दरवाजा न हो। वह परतंत्रता बन जाता है, कारागृह हो जाता है। कोई संन्यासी लौटना चाहे तो कोई क्या कर सकता है? वह लौट सकता है लेकिन आप उसकी निंदा करते हैं, अपमान करते हैं। कंडेमनेशन है उसके पीछे।
और इसीलिए हमने एक तरकीब बना रखी है कि जब कोई संन्यास लेता है, तो उसका भारी शोरगुल मचाते हैं। जब कोई संन्यास लेता है तो बहुत बैंडबाजा बजाते हैं। जब कोई संन्यास लेता है तो बहुत फूलमालाएं पहनाते हैं, और यह उपद्रव का दूसरा हिस्सा है, वह उस संन्यासी को पता नहीं है कि अगर वह कल लौटा तो जैसे फूलमालाएं फेंकी गईं, वैसे ही पत्थर और जूते भी फेंके जांएगे। और ये ही लोग फेंकने वाले, कोई दूसरा आदमी नहीं होगा। असल में इन लोगों ने फूलामालाएं पहना कर उससे कहा कि अब सावधान, अब लौटना मत, जितना आदर दिया है उतना ही अनादर प्रतीक्षा करेगा। यह बड़ी खतरनाक बात है। इसके कारण न मालूम कितने लोग संन्यास का आनंद ले सकते हैं, वे नहीं ले पाते। वे कभी निर्णय ही नहीं कर पाते कि जीवन भर के लिए। जीवन भर का निर्णय बड़ी महंगी बात है, बड़ी मुश्किल बात है। फिर हकदार भी नहीं हैं हम जीवन भर के निर्णय के लिए।
तो मेरी दृष्टि है कि संन्यास सदा ही सावधिक है।। आप कभी भी वापस लौट सकते हैं। कौन बाधा डालने वाला है? संन्यास आपने लिया था। संन्यास आप छोड़ते हैं। आपके अतिरिक्त इसमें कोई और निर्णायक नहीं है। आप ही डिसीसिव हैं, आपका ही निर्णय है। इसमें दूसरे की न कोई स्वीकृति है, न दूसरे का कोई संबंध है। संन्यास निजता है, मेरा निर्णय है। मैं आज लेता हूं, कल वापस लौटता हूं। न तो लेते वक्त आपसे अपेक्षा है कि आप सम्मान करें, न छोड़ते वक्त आपसे अपेक्षा है कि आप इसके लिए निंदा करें। आपका कोई संबंध नहीं है।
साथ ही ध्यान रहे, अब तक संन्यास सदा ही गुरु से बंधा रहा है। कोई गुरु दीक्षा देता है। संन्यास कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे कोई दे सके। संन्यास ऐसी चीज है जो लेनी पड़ती है, देता कोई भी नहीं। या कहना चाहिए कि परमात्मा के सिवाय और कौन दे सकता है संन्यास? अगरे मेरे पास कोई आता है और कहता है कि मुझे दीक्षा दे दें, तो मैं कहता हूं, मैं कैसे दीक्षा दे सकता हूं, मैं सिर्फ गवाह हो सकता हूं, विटनेस हो सकता हूं। दीक्षा तो परमात्मा से ले लो, दीक्षा तो परम सत्ता से ले लो, मैं गवाह भर हो सकता हूं, एक विटनेस हो सकता हूं कि मैं मौजूद था, मेरे सामने यह घटना घटी। इससे ज्यादा कोई अर्थ नहीं होता। गुरु से बंधा हुआ संन्यास सांप्रदायिक हो ही जाएगा। गुरु से बंधा हुआ संन्यास मुक्ति नहीं ला सकता, बंधन ले आएगा।
संन्यास उनका परमात्मा के बीच का संबंध होगा। इसके लिए कोई उत्सव नहीं किया जाएगा संन्यास देने के लिए, नहीं तो फिर छोड़ते वक्त भी उलटा उत्सव करना पड़ता है।"


ओशो,
क्या आपके आस-पास फिर संप्रदाय न बन जाएगा?

"नहीं, संप्रदाय नहीं बनेगा क्योंकि संप्रदाय बनने के लिए कुछ आवश्यक बातें हैं जो पहले होनी चाहिए।
एक, गुरु होना चाहिए, सिद्धांत होने चाहिय, शास्त्र होने चाहिए, कुछ विशेषण होने चाहिए। और यही नहीं, इस बात का आग"ह होना चाहिए कि इसके अलावा जो भी है, इसके विपरीत, इसके बाहर, इसको छोड़ कर जो भी है वह सरासर गलत है और यही बिलकुल सही है।
तो एक तो मैं कह रहा हूं कि उसे मैं संन्यासी कहता हूं जिसका कोई विशेषण नहीं। बिना विशेषण के संप्रदाय बनाना मुश्किल है। बिना विशेषण के संप्रदाय बन नहीं सकता। उसे संन्यासी कह रहा हूं जिसका कोई धर्म नहीं है। बिना धर्म के संप्रदाय कैसे बनाइएगा? उसे संन्यासी कह रहा हूं जिसका कोई धर्मग्रंथ नहीं है, जिसका कोई धर्मगुरु नहीं है, जिसका कोई मंदिर नहीं है, मस्जिद नहीं है, शिवालय नहीं है, गुरुद्वारा नहीं है।
तो संप्रदाय बनना मुश्किल है। कोशिश हमें करनी चाहिए कि संप्रदाय न बने, क्योंकि संप्रदाय ने धर्म का जितना नुकसान पहुंचाया है उतना किसी और चीज ने नहीं पहुंचाया है। अधर्म ने नहीं पहुंचाया है इतना नुकसान धर्म को जितना संप्रदायों ने पहुंचाया है।
और आखिरी बात कि जब मैंने कहा: अपने संन्यासी तो जीभ के चूक जाने से नहीं कहा। जीभ मेरी अजीब है, चूकती मुश्किल से ही है। पहली दफा जिन मित्र ने पूछा था कि आपके संन्यासी, तो मैंने इनकार किया था कि 'मेरे' मत कहिए। लेकिन प्रयोजन मेरा दूसरा था। प्रयोजन मेरा यह था कि संन्यासी 'मेरा' कैसे हो सकता है। लेकिन जब मैंने दुबारा कहा तो जीभ नहीं चूकी। मैंने कहा: अपने संन्यासी। संन्यासी मेरा नहीं हो सकता, लेकिन मैं तो संन्यासियों का हो सकता हूं।"

ओशो, कृष्ण स्मृति, प्रवचन 22


"किसी भी बात से बढ़ कर, संन्यास का अर्थ है: साहस, क्योंकि यह तुम्हारी निजता की घोषणा है, स्वतंत्रता की घोषणा है, इस बात की घोषणा है कि अब तुम सामूहिक पागलपन के, भीड़-मनोविज्ञान के हिस्से नहीं रहोगे। यह इस बात की घोषणा है कि अब तुम सारे जगत के बन रहे हो: तुम किसी देश, किसी धर्म-संगठन, किसी कौम, किसी धर्म के हिस्से नहीं होगे।"

ओशो, फिंगर्स पॉइंटिंग टु दि मून, प्रवचन 7


"यही मेरा अभिप्राय है जब मैं कहता हूं: संन्यासी हो जाओ। बस हो जाओ!
तुम्हारे भगवा रंग के वस्त्र, तुम्हारी माला - ये नियम हैं। यह एक खेल है। किंतु ये वह नहीं हैं जो मेरा वास्तविक संन्यास से अर्थ है।
लेकिन तुम खेलों के ऐसे अभ्यस्त हो कि इससे पहले कि मैं तुम्हें नियमरहित जीवन की ओर ले चलूं, तुम्हें बीच की अवधि में नियमों की आवश्यकता होगी। नियमों एवं खेलों के संसार से नियमरहित तथा बगैर खेलों के संसार की ओर जाते हुए एक पुल से गुजरना होगा।
तुम्हारे भगवा वस्त्र, तुम्हारी माला सिर्फ इस बीच वाली अवधि के लिए हैं। तुम नियमों को तुरंत नहीं छोड़ सकते, इसलिए मैं नये नियम देता हूं। लेकिन तुम पूरी तरह से सावधान रहो कि ये तुम्हारे चोगे तुम्हारा संन्यास नहीं हैं, तुम्हारी माला तुम्हारा संन्यास नहीं है, तुम्हारा नया नाम तुम्हारा संन्यास नहीं है।
संन्यास तो तब होगा जब कोई नाम नहीं होगा, जब तुम बिना नाम के हो जाते हो। तब कोई नियम नहीं होंगे। तब तुम इतने साधारण होओगे कि तुम पहचाने नहीं जाओगे।"

ओशो, ए बर्ड ऑन दि विंग, प्रवचन 9

 

"तुम किसी के भी नहीं बन सकते - यह सचाई है। किसी का हिस्सा बनने की आकांक्षा भ्रांति है। किसी का हिस्सा बनने का खयाल ही संगठन पैदा करता है; किसी का हिस्सा बनने का खयाल ही चर्च बनाता है। चूंकि तुम अकेले नहीं रह सकते, तुम अपने आपको किसी भीड़ में खो देना चाहते हो। संन्यासी वह है जिसने अपने अकेलेपन को स्वीकार कर लिया है। वह आधारभूत है, वह खो नहीं सकता। संन्यासी बन कर तुम किसी विशेष संस्था के हिस्से नहीं बन रहे हो-यह जरा भी कोई संस्था नहीं है। संन्यासी बन कर तुम ज्यादा साहसी बन रहे हो एक विशेष तथ्य को स्वीकार करने के लिए कि मनुष्य का होना अकेलेपन में है। यह इतना मूलभूत है कि इससे बचने का कोई उपाय नहीं है। यह उतना ही मूलभूत है जैसे मृत्यु। वास्तव में मृत्यु इसके अतिरिक्त कुछ नहीं कि वह तुम्हारे लिए खबर ला रही है कि तुम अकेले थे, और अब तुम अकेले हो।"

ओशो, दि डिवाइन मेलोडी, प्रवचन 10

 

ओशो,
पश्चिम से मेरी एक प्रिय मित्र ने संन्यास का नाम मांगते हुए आपको एक पत्र भेजा और इसके पहले कि उसे उत्तर मिलता वह यहां आ गई और यहां उसने संन्यास लिया। पत्र द्वारा जो नाम उसे भेजा गया था वह उस नाम से जो आपने उसे यहां दिया बिलकुल भिन्न था। मैंने जब इसके बारे में सुना तो मैं बहुत परेशान हो गई, क्योंकि मैं अपने नाम को हमेशा अपने पथ-सूचक के रूप में समझती थी। जब भी कभी मैं विभ"म में होती थी तो मैं अपने नाम को दिशा-निर्देशक के रूप में प्रयुक्त करती थी। आप हमें जो नाम देते हैं उसकी वास्तविक अर्थवत्ता क्या है?

"वीरा! सब पवित्र गाय का गोबर है। नामों से धोखा मत खाओ। तुम हमेशा कुछ पकड़ने की तलाश में रहते हो, ना-कुछ से बहुत कुछ बनाने के लिए। नाम जो मैं तुम्हें देता हूं वह तो सिर्फ प्रेमियों के मधुर अर्थहीन बातचीत की तरह है। इसके बारे में अधिक अनावश्यक उत्तेजना मत बनाओ। वास्तव में जब मैं तुम्हें कोई नाम देता हूं, तो कभी मुझसे पुनः उसका अर्थ पूछने मत आओ, क्योंकि मैं भूल चुका होता हूं। यह तो उसी क्षण में होता है जब मैं उसके इर्द-गिर्द अर्थ खड़ा करता हूं। फिर कैसे अपेक्षा करते हो कि मैं उसे याद रखूं?
मैं निश्चित ही तीस हजार या उससे अधिक नाम दे चुका हूं।
नाम केवल नाम है। तुम अनाम हो। तुम्हें कोई नाम नहीं समेट पाता, कोई भी नाम तुम्हें नहीं समेट सकता। वे तो केवल उपयोग के लिए चिह्न मात्र है--उपयोगी, उसमें कुछ भी आध्यात्मिक नहीं। परंतु क्योंकि मैं तुम्हारे नाम पर इतना अधिक ध्यान देता हूं और तुम्हें उसका अर्थ समझाता हूं, तुम उसमें उलझ जाते हो। वह तो केवल तुम पर ध्यान बरसा देने का मेरा अपना तरीका है, और कुछ नहीं; तुम पर मेरा प्रेम दर्शाने का मेरा अपना तरीका है, और कुछ भी नहीं।"

ओशो, दि डायमंड सूत्रा, प्रवचन 10


"मैं चाहूंगा कि मेरे संन्यासी जीवन को उसकी समग्रता में जीएं, लेकिन एक स्पष्ट शर्त के साथ, एक संपूर्ण शर्त के साथ, और वह शर्त है: सजगता, ध्यान। पहले ध्यान में गहरे जाओ, ताकि तुम अपने अचेतन को सभी विषैले बीजों से मुक्त कर सको, ताकि ऐसा कुछ भी न बचे जो भष्ट हो सकता हो, और तुम्हारे अंदर ऐसा कुछ भी न रह जाए जिसे शक्ति उभार सकती हो। और तब फिर जो भी करने जैसा लगे, करो।"

ओशो, दि धम्मपदा: दि वे ऑफ दि बुद्धा, भाग 6, प्रवचन 4


"तुम्हें शिक्षक करुणापूर्ण दिखाई देगा क्योंकि वह तुम्हें हर मार्गदर्शन देगा, वह पूरी जिम्मेवारी लेगा। वह तुम्हें रास्ता दिखाएगा, वह तुम्हें रास्ते पर ले जाएगा और तुम्हें सिर्फ पीछे चलना है।
सदगुरु नहीं चाहता कि तुम उसके पीछे चलो। नहीं, इससे ठीक उलटा: तुम उसके पीछे न चलो नहीं तो तुम स्वयं होने से वंचित रहोगे। फिर वह क्या करता है? वस्तुतः उसका सारा काम नकारात्मक है। वह तुम्हारी बैसाखियां, युम्हारे सहारे छीन लेता है। वह हर तरह के भय, चिंताएं, चुनौतियों के प्रति तुम्हें संवेदनशील बनाता है। यह सब नकारात्मक है। जहां तक सकारात्मकता का संबंध है, वह कुछ भी नहीं करता, वह सिर्फ एक दर्पण है। वह नहीं चाहता कि तुम उसकी नकल करो और उसकी शकल बनो। वह चाहता है कि तुम उसके भीतर झांको। उसकी कोई धारणाएं नहीं हैं। इसका मतलब दर्पण से सारी धूल उड गई है, अब दर्पण निर्मल है। तुम करीब आकर देख सकते हो, तुम्हें अपना चेहरा दिखाई देगा। दर्पण सिर्फ झलकाता है, वह कृत्य नहीं है, वह कुछ कर नहीं रहा है।
निश्चय ही तुम्हारे साथ मेरा संबंध अनूठा है। पहले तो यह संबंध नहीं है, क्योंकि दर्पण के साथ तुम क्या संबंध बनाओगे? तुम अपना चेहरा देख कर अनुगृहीत हो सकते हो, धन्यवाद दे सकते हो, लेकिन यह कोई संबंध नहीं हुआ। दर्पण का तुम्हारे साथ क्या संबंध हो सकता है? कोई संभावना नहीं है। दर्पण केवल है, वह किसी तरह संबंधित नहीं होता।
तो यह संबंध अनूठा है क्योंकि अगर तुम अन्य धर्मों में जाओ तो सदगुरु - जो कि सदगुरु है है नहीं लेकिन वे उसे सदगुरु कहते हैं-वह तथाकथित सदगुरु तुमसे हजारों बातों की मांग करेगा क्योंकि वह तुम्हारे लिए बड़ा भारी काम कर रहा है। मैं तुम्हारे लिए कुछ कर नहीं रहा हूं इसलिए मैं तुमसे कुछ मांग नहीं करता। सदगुरु की बड़ी शर्तें होंगी और तुम उन्हें पूरी न करो तो बड़ी भर्त्सना होगी; अगर तुमने शर्तें पूरी की तो फिर प्रशंसा, पुरस्कार मिलेगा।
मैं न तुम्हारी भर्त्सना कर सकता हूं और न पुरस्कार दे सकता हूं क्योंकि मेरी कोई शर्तें नहीं हैं जिन्हें तुम्हें पूरी करना हैं। मेरा शिष्य बनने का निर्णय तुम्हारा अपना है। इससे मेरा कोई संबंध नहीं है। मुझे सद्गुरु बनाना तुम्हारा निर्णय है उससे मेरा कोई लेना-देना नहीं है। मुझे कनवर्ट नहीं चाहिए, मैं कोई ईसाई मिशनरी नहीं हूं। मैं यह नहीं चाहता कि लोग मेरी विचारधारा को, मेरी जीवन-शैली को मानें। जरा भी नहीं, अन्यथा इन पैंतीस वर्षों में मैं लाखों लोगों को परिवर्तित कर देता। वे परिवर्तन के लिए तैयार थे लेकिन मैं तैयार नहीं था।
यह तुम्हारा निर्णय है। हमेशा स्मरण रखो, यहां जो भी घटता है वह तुम्हारा निर्णय है।
यदि तुम संन्यासी हो, यह तुम्हारा निर्णय है।
यदि तुम संन्यास छोड़ते हो, यह तुम्हारा निर्णय है।
यदि इसे तुम दुबारा लेते हो, यह तुम्हारा निर्णय है।
मैं सब कुछ तुम पर छोड़ता हूं।"

ओशो,  फ्रॉम अनकांशसनेस टु कांशसनेस, प्रवचन 18


"तो यह बहुत जरूरी था; मेरे लोगों को ढूंढने का कोई दूसरा उपाय नहीं था। सभी पहले से ही बंटे हुए हैं। यह दुनिया खुली हुई नहीं है: कोई ईसाई है, कोई हिंदू है, कोई मुसलमान है। ऐसा व्यक्ति ढूंढना बहुत कठिन है जो कुछ भी न हो। मुझे अपने लोगों को इन बंद समूहों में से ढूंढना था, लेकिन समूहों में घुसने के लिए मुझे इनकी भाषा बोलनी पड़ी। धीरे-धीरे मैंने उनकी भाषा को छोड़ दिया। उसी अनुपात में मेरा संदेश अधिक से अधिक साफ होता गया, और धीरे से मैंने उनकी भाषा को छोड़ दिया।
"और मेरे संन्यास के बाद, मैंने इन तीन सालों का अंतराल दिया ताकि जो कोई मुझे छोड़ना चाहे, छोड़ सकता है-क्योंकि मैं किसी के जीवन में दखल देना नहीं चाहता। यदि मैं तुम्हारे जीवन को कुछ दे सकूं, बढ़िया। यदि मैं तुम्हारे अंतर्तम को व जीवन को कुछ न दे सकूं तो अच्छा यही होगा कि तुम मेरे पास से चले जाओ।"

ओशो, फ्रॉम पर्सनैलिटी टु इंडिविजुअलिटी, प्रवचन 14

 

"मैंने संन्यास आंदोलन रोका नहीं है, मैंने इसे धर्म बनने से रोका है। आंदोलन एक प्रवाह होता है, यही आंदोलन का अर्थ है-वह गति कर रहा है, वह बढ़ रहा है। परंतु 'धर्म' मृत है, उसका गति करना रुक गया है, उसका बढ़ना रुक गया है। वह मृत है। उसके लिए श्मशान ही एकमात्र स्थान है। हर पुजारी या पुजारिन एक मृत धर्म चाहते हैं, क्योंकि उसके बारे में सब कुछ पहले से पता है, जाना-पहचाना हुआ है। उसमें कोई राय नहीं है, कोई विकास नहीं, कोई प्रगति नहीं। ईसाइयत को ही देखो, दो हजार साल बीत गए हैं, क्या वे जीसस क्राइस्ट से एक कदम भी आगे बढे हैं? इससे विकास रुकता है, प्रगति रुकती है।
अब मैं चाहता हूं कि मेरे लोग खुले रहें, जीवंत रहें, विकसित होते रहें, हमेशा तरोताजा और नवीन। यह एक नये किस्म की घटना बनी रहे-धार्मिकता: उसमें कोई लेबिल न चिपका हो,क्योंकि हर लेबिल एक पूर्ण विराम है। और मुझे पूर्ण विराम बिलकुल पसंद नहीं है, मुझे अर्ध विराम भी पसंद नहीं है। जीवन सदा बहता है....
मैंने माला वापिस ले ली है । भारत में यह एक प्रतीक है, क्योंकि यहां पर हजारों साल तक सभी धर्मों ने लाल वस्त्र और माला का प्रयोग संन्यास के प्रतीक की तरह किया है। मुझे संन्यास की उस परंपरागत धारणा को नष्ट करना था क्योंकि संन्यासी को ब्रह्मचारी रहना है, संन्यासी स्त्री से बात नहीं कर सकता, उसे छू नहीं सकता। संन्यासी घर में रह नहीं सकता, उसे मंदिर में रहना है। उसे एक वक्त ही भोजन लेना है, उसे बार-बार उपवास करना है, उसे अपने आपको सताना है - यह रुग्ण है।

हमारे पश्चिम में आने से अब लाल वस्त्रों तथा माला की आगे आवश्यकता नही रहीं, क्योंकि पश्चिम में ये कभी भी धर्म के प्रतीक नहीं रहे।
और, अधिक स्पष्ट रूप से कहें तो अब तुम पूरी तरह से बाहरी प्रतीकों के बिना हो। सारा कुछ जो बचा है, वह धार्मिकता का आवश्यक भीतरी भाग, वह है भीतर की ओर यात्रा-जो केवल तुम कर सकते हो। मैं तुम्हारे लिए यह नहीं कर सकता, कोई भी तुम्हारे लिए यह नहीं कर सकता।
अतः अब केवल आवश्यक गुण बचा है, धार्मिकता का सर्वाधिक मूलभूत गुण, और वह है: ध्यान।
तुम्हें भीतर की ओर जाना होगा।
अतः अब आगे के लिए तुम्हारे पास कोई बाहरी प्रतीक नहीं है, यह अच्छा है, क्योंकि तुम्हें केवल एक ही चीज याद रखनी है यदि तुम संन्यासी होना चाहते हो: कैसे साक्षी होने की साधना में चलना? अन्यथा ऐसी संभावना है कि लाल वस्त्र और माला पहन कर तुम पूर्णतया संतुष्ट हो जाओ कि तुम एक संन्यासी हो।
तुम नहीं हो।
वस्त्र किसी को नहीं बदलते, न ही माला किसी का रूपांतरण करती है। परंतु तुम अपने को धोखा दे सकते हो।
अब मैं वह सब तुमसे लिए ले रहा हूं और केवल एक सरल सी चीज बाकी छोड़ रहा हूं। तब तुम धोखा नहीं दे सकते: या तो तुम उसे करते हो या तुम नहीं करते हो। बिना उसके किए तुम संन्यासी नहीं हो।
अतः आंदोलन अब अपनी शुद्धतम अवस्था में आ चुका है, सर्वाधिक आवश्यक के स्तर पर; और उसे विदा नहीं कर दिया गया है।"

ओशो, फ्रॉम बांडेज टु फ्रीडम, प्रवचन 17

 

"प्रश्न 'मेरा' संन्यासी होने का नहीं है, प्रश्न है संन्यासी होने का। 'मेरा' संन्यासी होने के लिए निश्चित ही एक विशेष प्रतिबद्धता की, एक विशेष समर्पण की जरूरत होगी। और मैं नहीं चाहता कि तुम मुझे समर्पित होओ या मेरे प्रति प्रतिबद्ध होओ। मैं चाहता हूं कि तुम प्रकृति के प्रति समर्पित होओ, अस्तित्व के प्रति प्रतिबद्ध होओ। तुम्हें 'मेरा' संन्यासी होने की आवश्यकता नहीं है, तुम्हें केवल संन्यासी होना है - और मेरा संन्यासी होने का केवल यही रास्ता है।"

ओशो, बियांड साइकोलॉजी, प्रवचन 15

 

"अब संन्यास एक बिलकुल भिन्न आंदोलन होगा: यह अधिक प्रामाणिक खोजियों के लिए होगा। यह केवल उस किसी के लिए नहीं होगा जो समाज को बदलना चाहता है, क्योंकि वह समाज से असंतुष्ट हो चुका है। वह इस समाज के स्थान पर दूसरा समाज चाहता है; इसलिए वह दूसरे समाज के तौर पर संन्यास कम्यून से जुड़ता है - परंतु उसके पास सत्य को पाने की इच्छा और प्यास नहीं है।
क्योंकि इस समाज मे लोग लाल वस्त्र पहने हुए हैं और वह भद्दा, विषम और अजीब नहीं दिखना चाहता, वह लाल वस्त्र पहनना शुरू कर देता है और संन्यासी बन जाता है।
परंतु उसकी असलियत यह है कि वह केवल बड़े संसार से भाग रहा है, जहां वह पूरी तरह ऊब चुका था और जाने को कोई दूसरा स्थान नहीं था। कम्यून सब प्रकार के लोगों का शरण-स्थल बन गया था।
अब संन्यास एक स्कूल होगा, धर्म के रहस्य का विद्यालय।
केवल वे इससे जुड़ेंगे जो विकास चाहते हैं और बदलना चाहते हैं। और ऐसे लाखों लोग हैं जो अपने प्राणों में अधिक सजगता चाहते हैं, जिन्हें लगता है कि वे तंद्रा में हैं और बेहोश हैं।
अतः फिकर न करें यदि कुछ और भी पुराने संन्यासी चले जाते हैं, नये लोग, नया खून अंदर आ रहे होंगे।"

ओशो, दि पाथ ऑफ दि मिस्टिक, प्रवचन 37

 

ओशो,
क्या आपने अब संन्यास-दीक्षा देनी और शिष्य बनाना बंद कर दिया है? क्या मैं आपका शिष्य बनने से वंचित ही रह जाऊंगा?

"शिष्य बनाया नहीं जाता, शिष्य बनना पड़ता है। तुम जब किसी से प्रेम करते हो, तो तुम क्या पहले पूछते हो, आज्ञा लेते हो? प्रेम हो जाता है। प्रेम न किसी आज्ञा को मानता है और न किसी अनुमति को, न किसी विधि को, न किसी विधान को। शिष्यत्व क्या है? प्रेम का ऊंचा से ऊंचा, गहरा से गहरा नाम है। तुम मुझे प्रेम करना चाहते हो, तो मैं कैसे रोक सकता हूं? तुम अगर मेरे प्रेम में आंसू गिराओ, तो मैं कैसे रोक सकता हूं? और तुम अगर, जिसे मैं ध्यान कहता हूं, उस ध्यान में डुबकियां लगाओ, तो मैं कैसे रोक सकता हूं? जिसे शिष्य होना है, उसके लिए कोई भी नहीं रोक सकता। और मैंने इसीलिए, जो औपचारिकता थी शिष्य बनाने की, वह छोड़ दी। क्योंकि अब मैं केवल उनको ही चाहता हूं जो अपने से मेरी तरफ आ रहे हैं, किसी और कारण से नहीं। अब पूरा उत्तरदायित्व तुम्हारे ऊपर है।
जैसे स्कूल की पहली कक्षा में हम बच्चों को पढाते हैं - 'आ' आम का, 'ग' गणेश का। पहले हुआ करता था गणेश का, अब तो 'ग' गधे का। यह सेक्युलर राज्य है, यहां गणेश का नाम किताब में आना ठीक नहीं है। लेकिन 'ग' से न कोई गणेश का लेना-देना है, न कोई गधे का। लेकिन बच्चे को सिखाने के लिए...क्योंकि बच्चे को ज्यादा रस गधे में आता है, गणेश में आता है; वह जो 'ग' का अक्षर है, उसमें बच्चे को कोई रस मालूम नहीं होता। लेकिन धीरे-धीरे गधा भी भूल जाएगा, गणेश भी भूल जाएंगे, 'ग' ही रह जाएगा और 'ग' ही काम पड़ेगा।
अगर विश्वविद्यालय तक पहुंचते-पहुंचते भी, हर वक्त, पढ़ते वक्त पहले तुम्हें पढ़ना पड़े 'आ' आम का, 'ग' गधे का, तो हो गई पढ़ाई। एक वाक्य भी पूरा पढ़ना मुश्किल हो जाएगा। और पढ़ने के बाद यह भी समझना मुश्किल हो जाएगा कि इसका मतलब क्या है? क्योंकि उसमें न मालूम कितने गधे होंगे, कितने गणेश होंगे, कितने आम होंगे।
छोटे बच्चों की किताब में तस्वीरें होती हैं, रंगीन तस्वीरें होती हैं, बड़ी तस्वीरें होती हैं, छोटे अक्षर होते हैं। और जैसे-जैसे ऊंची क्लास होने लगती है, तस्वीरें छोटी होने लगती हैं, अक्षर ज्यादा होने लगते हैं। धीरे-धीरे तस्वीरें खो जाती हैं, सिर्फ अक्षर रह जाते हैं। विश्वविद्यालय की कक्षा में कोई तस्वीर नहीं होती, सिर्फ अक्षर होते हैं।
हमारा अक्षर शब्द भी बड़ा प्यारा है। उसका अर्थ है: जो कभी न मिटेगा। क्योंकि गणेश भी मिट जाते हैं, गधे भी मिट जाते हैं, मगर अक्षर रह जाता है। वह क्षर नहीं होता। उसका कोई क्षय नहीं होता।
तो मुझे जब शुरू करना पड़ा तो संन्यास भी मैंने दिया, शिष्य भी मैंने बनाए। मगर कब तक गधों को और गणेशों को, और कब तक आम को और इमली को कब तक खींचना? अब संन्यास प्रौढ़ हुआ है। अब औपचारिकताओं की कोई खास बात नहीं। अब तुम्हारा प्रेम है तो शिष्य हो जाओ। कहने की भी बात नहीं, किसी को बताने की भी जरूरत नहीं। अब तुम्हारा भाव है तो संन्यस्त हो जाओ। अब सारा दायित्व तुम्हारा है। यही तो प्रौढ़ता का लक्षण होता है। अब तुम्हारा हाथ पकड़ कर कब तक मैं चलूंगा? इसके पहले कि मेरे हाथ छूट जाएं, मैंने खुद तुम्हारा हाथ छोड़ दिया है। ताकि तुम खुद अपने पैर, अपने हाथ, अपने दायित्व पर खड़े हो सको और चल सको।
नहीं, तुम्हें शिष्य होने से रुकने की कोई जरूरत नहीं है। न संन्यस्त होने से कोई तुम्हें रोक सकता है। लेकिन अब यह सिर्फ तुम्हारा निर्णय है, और तुम्हारे भीतर की प्यास और तुम्हारे भीतर की पुकार है। मैं तुम्हारे साथ हूं। मेरा आशीष तुम्हारे साथ है।
लेकिन अब तुम्हें समझाऊंगा नहीं कि तुम संन्यासी हो जाओ; और समझाऊंगा नहीं कि ध्यान करो। अब तो इतना ही समझाऊंगा कि ध्यान क्या है। अगर इससे ही तुम्हारे भीतर प्यास पैदा हो जाए, तो कर लेना ध्यान। अब आज्ञा न दूंगा कि प्रेम करो। अब तो सिर्फ प्रेम की व्या"या कर लूंगा, और सब तुम पर छोड़ दूंगा। अगर प्रेम की अनूठी, रहस्यमय बात को सुन कर भी तुम्हारे हृदय की धड़कनों में कोई गीत नहीं उठता, तो आदेश देने से भी कुछ न होगा। और अगर गीत उठता है, तो यह कोई लेने-देने की बात नहीं है। तुम शिष्य हो सकते हो, तुम ध्यान कर सकते हो, तुम संन्यस्त हो सकते हो, तुम समाधिस्थ हो सकते हो, तुम इस जीवन की उस परम निधि को पा सकते हो, जिसे हमने मोक्ष कहा है।
लेकिन यह सब अब तुम्हें करना है। अब कोई और तुम्हें धक्का दे पीछे से, वे दिन बीत गए।
अब तुम बिलकुल स्वतंत्र हो। तुम्हारी मर्जी और तुम्हारी मौज और तुम्हारी मस्ती ही निर्णायक है।"

ओशो, कोंपलें फिर फूट आईं, प्रवचन 8

 

ओशो,
आपके पास बरसों रहने के बाद मैं गुरु-शिष्य संबंध के बारे में तो जानता हूं, क्या आप शिष्य और शिष्य के संबंध के बारे में कुछ बताएंगे?

"ऐसा कोई संबंध नहीं है। अतीत में शिष्यों ने संगठन बनाए हैं। वे उनके अपने संबंध थे।
'हम ईसाई हैं, या हम मुस्लिम हैं या हम एक विश्वास को मानते हैं और इसलिए हम भाई-बहन हैं। हम विश्वास के लिए जीएंगे और मरेंगे।'
सभी संगठन शिष्यों के आपसी संबंधों से पैदा हुए हैं। सच तो यह है कि दो शिष्यों का आपस में कोई संबंध नहीं होता। हर शिष्य गुरु के साथ अपनी निजता में गुरु से जुडा होता है। एक गुरु लाखों शिष्यों से जुड़ सकता है लेकिन वह संबंध व्यक्तिगत होता है न कि संघीय।
शिष्यों का कोई रिश्ता नहीं होता। हां, उनकी मित्रता होती है, प्रेमपूर्णता होती है। मैं रिश्ता शब्द से बचना चाहता हूं, बस मैत्रीभाव-क्योंकि वे सभी हमसफर होते हैं जो एक ही राह पर चलते हैं, एक ही गुरु से प्रेम करते हैं, लेकिन वे आपस में गुरु के द्वारा जुड़े होते हैं। वे सीधे संबंधित नहीं होते।
अतीत में यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी कि शिष्य संगठित हुए, एक दूसरे से संबंधित हुए, और वे सभी अज्ञानी थे। सब अज्ञानी लोग मिलकर केवल उपद्रव पैदा कर सकते हैं और कुछ नहीं। सभी धर्मों ने वही किया है।
मेरे लोग मुझसे व्यक्तिगत रूप से जुड़े हैं। और चूंकि वे एक ही राह पर हैं, इसलिए वे निश्चित ही एक-दूसरे से परिचित हो जाते हैं। एक मित्रता पैदा होती है; एक प्रेमपूर्ण माहौल; पर मैं इसे किसी तरह का संबंध नहीं कहना चाहता।
शिष्यों के एक-दूसरे से सीधे जुड़ने से धर्म, संप्रदाय, पंथ और अंततः युद्ध व लड़ाई को ही जन्म मिला और हमने बहुत ज्यादा दुख झेले हैं। वे कुछ और कर भी नहीं सकते हैं। कम से कम मेरे साथ याद रखें: कि तुम एक-दूसरे से किसी भी तरह हरगिज नहीं जुड़े हो। केवल एक तरल मित्रता काफी है, ठोस दोस्ती की जरूरत नहीं है। और उतना ही पर्याप्त है, अत्यधिक सुंदर है, और उससे भविष्य में मानवता को कोई हानि पहुंचाने की भी संभावना नहीं है।"

ओशो,  बियांड एनलाइटनमेंट, प्रवचन 2


"दीक्षा निश्चित रूप से मतलब है कि तुमने एक खतरनाक जिंदगी में कदम रख दिया है। तुमने अंधेरे में मुझे अपना मित्र स्वीकार किया है और तुमने एक गहरे विश्वास के साथ अपना हाथ मेरे हाथ में दे दिया है। लेकिन मैंने कोरा चेक कभी इस्तेमाल नहीं किया है और न ही मैंने कभी भी किसी की जिंदगी में दखल दिया है। यह केवल तुम्हारी तरफ से है, मैं इससे बिलकुल बाहर हूं। यह तुम्हारी दीक्षा है और तुम्हारी जिंदगी को परिवर्तित करने के लिए सौंपना तुम्हारी पहल है। लेकिन यह सारा कृत्य और सारी जिम्मेवारी तुम्हारी है।"

ओशो,  दि न्यू डॉन, प्रवचन 30


"यह मायने नहीं रखता कि तुम संन्यासी हो गए हो; जब तक तुम्हारा संन्यास तुम्हारे भीतर एक ध्यानमय स्थिति को नहीं जन्म देता है तब तक इससे कुछ नहीं बदलेगा।"

ओशो, दि ग्रेट पिल्ग्रिमेज, प्रवचन 11


"
किसी को औपचारिक अथवा आधिकारिक रूप से संन्यासी होना जरूरी नहीं है। कोई भी खोज सत्य की खोज में लगा कोई भी व्यक्ति संन्यासी है। और किसी संन्यासी को 'मेरा' होने की जरूरत नहीं है। संन्यासी अनुयायी नहीं है, ज्यादा से ज्यादा एक सह-यात्री। अगर तुम सत्य की खोज और अनुसंधान में लगे हो, जीवन के अर्थ और सार्थकता की खोज में लगे हो, तो उतना पर्याप्त है।"

ओशो,  हरि ओम् तत्सत्, प्रवचन 17

 

"जिस दिन तुम संन्यास में दीक्षित होते हो, जरूरी नहीं कि वह संन्यास की शुरुआत हो। यह तो तुम्हारी तरफ से मात्र इशारा है कि मैं चाहता हूं कि मुझे संन्यास घटे। दीक्षा सिर्फ अस्तित्व को तुम्हारा हां कहना है, और अपने सारे दरवाजे व खिड़कियां ताजा हवा और सूर्य के लिए खोलना ताकि वे अंदर आ सकें और तुम्हें शुद्ध कर सकें।
"किसी दिन संन्यास शुरू होगा। यह दीक्षा के पल में भी शुरू हो सकता है, यदि तुम्हारी त्वरा, सघनता, तुम्हारी श्रद्धा और तुम्हारा प्रेम पूर्ण हो तो। लेकिन यह बहुत कम ही होता है। यह हमेशा साठ प्रतिशत, चालीस प्रतिशत; सत्तर प्रतिशत, तीस प्रतिशत...यहां कुछ लोग हो सकते हैं जिनकी श्रद्धा निन्यानबे प्रतिशत हो, लेकिन एक प्रतिशत  सालों या जन्मों तक रोकने के लिए पर्याप्त है। जब तक कि तुम सौ प्रतिशत खुले न हो, जब तक कि ना शब्द तुम्हारे शब्दकोष से गिर न जाए, संन्यास की महान क्रांति तुम्हारे जीवन में नहीं घटेगी...
"संन्यास के लिए पूर्ण हां की जरूरत है और तब यह इसी पल में घट सकता है। लेकिन तुम्हारे छोटे-छोटे संदेह - ये हो सकते हैं बहुत छोटे हों - यह ऐसे ही है जैसे कि रेत का छोटा सा कण तुम्हारी आंखों में गिर जाए और तुम अपनी आंखें नहीं खोल सकते। रेत का एक छोटा सा कण इस विशाल सुंदर संसार को देखने से रोक सकता है। तुम्हारी अंतस की आंखों के लिए संदेह भी रेत के छोटे से कण की तरह है। यह तुम्हें जीवन की विराटता और सौंदर्य, तुम्हारी अपनी संभावना और तुम्हारी अपनी खिलावट जो कि जन्मों से विकसित होने व खिलने का इंतजार कर रही है, को देखने से रोक सकता है, लेकिन तुमने कोई मौका नहीं दिया।"

ओशो, ओम शांति शांति शांति, प्रवचन 26

 

ओशो,
शिष्य होने की पहली आवश्यकता क्या है?

"कुछ भी नहीं।
"खुला हृदय, प्रेम हृदय, स्वयं में एक गहरी श्रद्धा और किसी चीज की जरूरत नहीं। और तुम्हें किसी गुरु को समर्पित होने की जरूरत नहीं है, तुम्हें किसी परमात्मा की पूजा करने की जरूरत नहीं है, तुम्हें किसी कल्पित देवता की प्रार्थना करने की जरूरत नहीं है। तुम्हें किसी मानव निर्मित मंदिर या चर्च जाने की जरूरत नहीं है यह जानने के लिए तुम्हारे अंतस में क्या छिपा है। शिष्य गुरु का बीज है। शिष्य भी कमल का फूल है, यह ऐसे ही जैसे कि तुम कहीं और देख रहे हो अपने ही भीतर देखने की जगह।"

ओशो, लाइव झेन, प्रवचन 7

 

"इसलिए यह नितांत जरूरी था; मेरे लोगों को मुझ तक खींचने का और कोई उपाय नहीं था। लोग पहले से ही विभाजित हैं। यह खुली दुनिया नहीं है -  यहां कोई ईसाई है, कोई हिंदू है, कोई मुसलमान है। बहुत मुश्किल है ऐसा इनसान खोज पाना जो पहले से ही कुछ नहीं है। मुझे इन बंद संकुचित समूहों से अपने लोग खोजने थे; लेकिन इन समूहों में घुसने के लिए मुझे उनकी भाषा में बोलना पड़ा। धीरे-धीरे मैंने उनकी भाषा छोड़ दी। उसी अनुपात में मेरा संदेश और-और साफ होता गया और उनकी भाषा धीरे से मैंने छोड़ दी।
और मेरे संन्यास आंदोलन के बाद यह तीन वर्ष का समय मैंने एक अंतराल के रूप में दिया ताकि कोई भी जो मुझे छोड़ना चाहता हो छोड़ सके-क्योंकि मैं किसी की जिंदगी में दखल नहीं देना चाहता। अगर मैं कुछ उत्थान कर सकूं, तो अच्छा। अगर मैं तुम्हारे और तुम्हारे प्राणों का उत्थान न कर सकूं तो यह अच्छा होगा कि तुम मुझसे दूर हट जाओ।
मेरे लोग संन्यासी हो सकते हैं और साथ ही नितांत विद्रोही भी, क्योंकि वे किसी पर निर्भर नहीं हैं। उनका ध्यान उनका व्यक्तिगत मामला है।"

ओशो, दि बुद्धा: द एंप्टीनेस ऑफ दि हार्ट, प्रवचन 6

 

"मैं तुम्हें संन्यासी होना सिखाता हूं-और  'मेरा' संन्यासी नहीं। यह तुम्हारा ही संन्यास है, यह तुम्हारी ही सत्य की खोज है।"

ओशो, क्रिश्चिएनिटी: दि डेडलिएस्ट पाय़जन, प्रवचन 7

 

ओशो,
अच्छा, तो भविष्य में संन्यासी होने का क्या अर्थ होगा, आज से आगे?

"इस तिथि से आगे संन्यासी का सरल सा अर्थ होगा कि वह यहां ध्यान-विधियों में दीक्षित हुआ है, और वह अपने प्रति प्रतिबद्ध है कि वह इस पथ का अनुसरण करेगा।
परंतु अब यह निजी और अकेले का होने जा रहा है। वह स्वयं उत्तदरायी होगा। यह कोई सामूहिक बात नहीं होगी, कोई धर्म-सभा नहीं होगी।"

ओशो,  दि लास्ट टेस्टामेंट, भाग 3, प्रवचन 9

 

"संन्यास का सरल सा अर्थ है कि उन्होंने ध्यान का मार्ग और उल्लास का जीवन तथा उल्लास मनाना स्वीकार किया है। यह तुम्हारे जीवन को आनंदपूर्ण बनाना स्वीकार करना है। अतः संन्यास एक बिलकुल अलग बात है। संन्यासी रहेंगे। मैंने संन्यासियों के सभी बाहरी प्रतीक गिरा दिए हैं। यदि वे इन्हें रखना चाहते हैं-यह उन पर है। अपनी ओर से मैंने गिरा दिया है। उनको किसी माला की जरूरत नहीं है। उनको लाल वस्त्रों की आवश्यकता नहीं है। मैं सब मिला कर इतना ही पसंद करूंगा...मेरा उन्हें परामर्श, कि तुम एक संन्यासी हो, केवल ध्यान ही आवश्यक चीज है जिसका तुम्हें पालन करना है।"

ओशो, दि लास्ट टेस्टामेंट, भाग 3, प्रवचन 11

 

"मैंने संन्यासियों से वह सब कुछ ले लिया है जो उन्हें भिन्न बनाता है। मैंने उन्हें बता दिया है कि अब लाल वस्त्र पहनना आवश्यक नहीं है। सभी रंग हमारे हैं। मेरे फोटो वाली माला पहनने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मैं कोई उद्धारक, मसीहा या पैंगबर नहीं हूं। मेरे पास तुम्हें देने को परमात्मा नहीं है, मैं केवल तुम्हें स्वयं को जानने का विज्ञान दे सकता हूं। अतः तुम्हें सिर्फ समझना होगा कि मैं केवल एक मित्र हूं, उससे अधिक कुछ नहीं। मैं तुममें से एक हूं, इसलिए किसी पूजा की आवश्यकता नहीं है और अपने को किसी समूह का हिस्सा समझने की जरूरत नहीं है। तुम सभी वैयक्तिक इकाई हो।"

ओशो, दि लास्ट टेस्टामेंट, भाग 3, प्रवचन 12

 

"मैं बहुत श्रम करता रहा हूं वह सब छोड़ने के लिए जो बाहरी है, ताकि तुम्हारे अन्वेषण के लिए केवल आंतरिक ही बचे।
अन्यथा मनुष्य का मन बहुत अपरिपक्व है। वह बाहरी प्रतीकों से ग्रस्त होना शुरू कर देता है। ऐसा विश्व के सभी धर्मों के साथ घटित हुआ है।
मैं चाहता हूं कि मेरे लोग इसे साफ-साफ समझ लें। न तो तुम्हारे कपड़े काम आने वाले हैं, न तुम्हारे बाहरी अनुशासन और न ही कोई ऐसी बात जो तुम्हें परंपरा से मिली है और जिसको तुमने केवल विश्वास के आधार पर स्वीकार कर लिया है। एक मात्र चीज जो तुममें क्रांति पैदा कर सकती है, वह है मन के पार चेतना के संसार में प्रवेश। इसके अलावा कुछ भी धार्मिक नहीं है।
परंतु शुरुआत करने के लिए और एक ऐसे संसार में जो बाहरी चीजों से बहुत ज्यादा जकड़ा हुआ है, मुझे संन्यास भी बाहरी चीजों के साथ शुरू करना पड़ा: अपने कपड़े भगवा रंग में बदलो, माला पहनो, ध्यान करो...परंतु जोर केवल ध्यान पर था।
लेकिन मैंने पाया कि लोग अपने कपड़े तो बड़ी सुगमता से बदल सकते हैं, वे अपने मन नहीं बदल सकते। वे माला तो पहन सकते हैं, लेकिन वे अपनी चेतना की ओर नहीं बढ़ सकते। और क्योंकि वे भगवा रंग के वस्त्रों में हैं, माला पहने हुए हैं, एक नया नाम लिया है, वे मानने लगते हैं कि वे संन्यासी बन चुके हैं।
संन्यास इतना सस्ता नहीं है। अतः यह समय है और तुम पर्याप्त परिपक्व हो: वह शुरुआती दौर खत्म हुआ।
मैं नहीं चाहता कि मेरे लोग अनावश्यक बातों में खो जाएं। शुरू में यह आवश्यक था। अब वर्षों से मुझे सुनने के बाद मुझे समझने के बाद तुम इन सभी बाहरी बंधनों से मुक्त कर दिए जाने की अवस्था में हो। और पहली बार तुम सचमुच संन्यासी हो सकते हो, यदि तुम भीतर की ओर गति कर रहे हो।"

ओशो, दि लास्ट टेस्टामेंट, भाग 6, प्रवचन 12

 

संन्यास आंदोलन 'मेरा' नहीं है। यह 'तुम्हारा' नहीं है।
यह यहां था जब मैं यहां नहीं था। यह यहां होगा जब मैं यहां नहीं होऊंगा।
संन्यास आंदोलन का सरल सा अर्थ है: सत्य के खोजियों का आंदोलन। वे हमेशा से यहां रहे हैं। सत्य के खोजियों की जमात हमेशा रही है...मैं इसे ही संन्यास कहता हूं। यह शाश्वत है। यह सनातन है। इसका मेरे से कुछ लेना-देना नहीं है। लाखों लोगों ने इसमें योगदान किया है। मैंने भी अपने हिस्से का योगदान किया है। यह और-और समृद्ध होता चला जाएगा।
जब मैं चला जाऊंगा, और-और लोग आएंगे और इसमें समृद्धि करेंगे। मैं चला जाऊंगा; इसका यह अर्थ नहीं कि संन्यास आंदोलन चला जाएगा। यह किसी की मालकियत नहीं है।
मैं तुम्हें सत्य नहीं दे सकता, परंतु मैं तुम्हें चांद की ओर दिखा सकता हूं...कृपा करके मेरी अंगुली से आसक्त मत हो जाना जो चांद की ओर इशारा कर रही है। यह अंगुली विदा हो जाएगी। चांद रहेगा, और खोज जारी रहेगी। और जब तक एक भी मनुष्य पृथ्वी पर है, संन्यास के फूल खिलते रहेंगे।
पहली बात, मनुष्य के पूरे इतिहास में मैं अकेला व्यक्ति हूं जिसने तुम्हें वैयक्तिक निजता दी है। तथाकथित गुरु बिलकुल उलटा कर रहे थे: वे तुम्हारी वैयक्तिक निजता छीन रहे थे। उनका सारा प्रयत्न यह होता था कि तुम उन्हें समर्पण कर दो। कि तुम्हारा काम था केलव उनके चरण छूना और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना। मेरा प्रयास बिलकुल अलग है। तुम किसी के चरण छूने से कोई आशीर्वाद नहीं प्राप्त कर सकते। बल्कि उलटे तुम उस आदमी को अधिक अहंकारी तथा रुग्ण बना रहे हो। अहंकार उसकी आत्मा का कैंसर है। किसी को रुग्ण मत बनाओ। करुणावान बनो! कभी किसी के चरण मत छूओ।
मेरा प्रयत्न है कि तुम्हारे मन से सभी परंपराएं, मतांधताएं, अंधविश्वास, मान्यताएं छीन लिए जाएं ताकि तुम अ-मन की दशा को उपलब्ध हो सको...मौन की चरम अवस्था जहां एक विचार भी नहीं उठता, जहां तुम्हारी चेतना की झील में एक लहर भी नहीं होती।
और यह सब कुछ तुम्हारे द्वारा किया जाना है। मैं नहीं कह रहा हूं कि "केवल मेरा अनुकरण करो। मैं तुम्हारा उद्धारकर्ता हूं। मैं तुम्हें बचा लूंगा।" यह सब कूड़ा-करकट है। तुम्हारे स्वयं के अतिरिक्त तुम्हें कोई बचा नहीं सकता। और केवल आत्मिक स्वतंत्रता ही स्वतंत्रता कहलाने योग्य स्वतंत्रता है।

ओशो, दि लास्ट टेस्टामेंट, भाग 6, प्रवचन 14

माला के विषय में संन्यास अकादमी को सन 1989 में ओशो द्वारा दिया गया अंतिम संदेश।

ओशो ने संदेश भिजवाया कि अब माला पहनने की जरूरत नहीं है। संन्यास एक अंतर्यात्रा है, इसका बाहरी किसी चीज से कोई लेना-देना नहीं है। कुछ लोग इस बात से विचलित थे इसलिए इस बात को पुनः ओशो के वापस ले जाया गया और उन्होंने संन्यास अकादमी को फिर संदेश भिजवाया कि "यदि तुम्हें माला पहननी ही है तो अपने घर पर सिर्फ ध्यान करते समय पहनो।"



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